ऋषि ज्ञान - Rushi Gyan

रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता .

ऋषि के चिंतन में मानव को बदलने की हिम्मत हे क्यूंकी ऋषि की बुद्धि ईश्वर को समर्पित होती हे . ऋषि अपने को मंत्र-करता नहीं लेकिन मंत्र-द्रष्टा समझता हे . “ऋषय: मन्त्र - द्रष्टार: न तू कर्तार:” . मानव बुद्धि से उत्पन्न विचार मानव को बदल शके या न बदल शके , लेकिन ईश्वर समर्पित बुद्धि से - ईश्वर कृपा से उत्पन्न विचार मानव को बदल शके इसमें कोई शंका नहीं हो शकती .

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